राजमहल की पहाड़ियों में भूवैज्ञानिक रहस्यों की खोज
साहिबगंज :
झारखंड के साहिबगंज स्थित राजमहल की पहाड़ियाँ एक बार फिर शोध और शिक्षा का केंद्र बनीं। पटना विश्वविद्यालय के भूविज्ञान विभाग के छात्रों का दल फ़ील्ड ट्रिप के दौरान राजमहल पहाड़ी की विशेषता और संरचना से संबंधित जानकारी संग्रह किया । इस दल का मार्गदर्शन मॉडल कॉलेज राजमहल के प्राचार्य और प्रख्यात भूवैज्ञानिक डॉ. रणजीत कुमार सिंह ने किया।
भ्रमण का मुख्य उद्देश्य :
यात्रा का उद्देश्य छात्रों को किताबों में पढ़ी गई ‘राजमहल ट्रैप’ की चट्टानी संरचनाओं, प्राचीन जीवाश्मों (Fossils) और ज्वालामुखीय प्रक्रियाओं को करीब से दिखाना और समझाना था।
यात्रा के मुख्य पड़ाव और खोज :
बोरियो क्षेत्र: कार्यक्रम की शुरुआत बोरियो से हुई, जहाँ छात्रों ने लावा के बहाव के बीच बनी मिट्टी और पत्थर की परतों (Intertrapian beds) का अध्ययन किया। डॉ. सिंह ने यहाँ पत्थर बन चुकी लकड़ियों और पत्तियों के जीवाश्मों के महत्व को समझाया।
मंडरो फ़ॉसिल पार्क: यहाँ छात्रों ने करोड़ों साल पुराने जीवाश्म देखे। डॉ. सिंह ने बेसाल्ट चट्टानों के गोलाकार टूटने (Spheroidal Weathering) की प्रक्रिया को बहुत ही सरल तरीके से छात्रों को समझाया।
मोती झरना: यहाँ छात्रों ने लावा के ठंडे होने से बनी विशेष खंभेनुमा आकृतियों (Columnar Joints) का बारीकी से अध्ययन किया।
दल ने केवल मुख्य पार्कों तक ही सीमित न रहकर कटघर, महाराजपुर, वृंदावन पहाड़, चाइना क्ले (मिट्टी) खनन क्षेत्र और मॉडल कॉलेज परिसर का भी दौरा किया। यहाँ छात्रों ने अलग-अलग प्रकार के खनिजों और चट्टानों की विविधता को देखा।
भ्रमण के दौरान डॉ. रणजीत कुमार सिंह ने एक अत्यंत उत्साहजनक बात कही कि राजमहल की पहाड़ियों में आज भी प्रकृति के कई रहस्य दबे हुए हैं। यदि यहाँ और अधिक गहन शोध और वैज्ञानिक खुदाई की जाए, तो भविष्य में डायनासोर से जुड़े अवशेष मिलने की प्रबल संभावना है।
यह शैक्षणिक यात्रा छात्रों के लिए केवल एक भ्रमण न होकर ज्ञान का एक बड़ा अवसर साबित हुई। डॉ. सिंह के मार्गदर्शन में छात्रों ने ज्वालामुखी विज्ञान और प्राचीन वनस्पति विज्ञान की व्यावहारिक समझ विकसित की, जो उनके भविष्य के शोध कार्यों में मील का पत्थर साबित होगी।