साहिबगंज/धनबाद: आईआईटी (आईएसएम) धनबाद के गोल्डन जुबली हॉल में आयोजित राष्ट्रीय पर्यावरण कार्यशाला में साहिबगंज महाविद्यालय के प्राचार्य सह प्रसिद्ध भू-वैज्ञानिक व पर्यावरणविद् डॉ रणजीत कुमार सिंह ने अपनी शोध प्रस्तुति दी। 20 सितंबर 2026 को आयोजित इस उच्चस्तरीय कार्यक्रम में झारखंड के महामहिम राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित थे।
आरोग्य भारती झारखंड प्रांत के प्रांत उपाध्यक्ष के पद पर सुशोभित डॉ रणजीत कुमार सिंह ने कार्यशाला में “पर्यावरण और जैव विविधता: प्रकृति के साथ संतुलित सह-अस्तित्व की आवश्यकता” विषय पर अपना व्याख्यान प्रस्तुत किया।
पर्यावरण केवल पेड़-पौधों तक सीमित नहीं, संपूर्ण प्राकृतिक व्यवस्था का हिस्सा
अपने संबोधन में डॉ रणजीत कुमार सिंह ने कहा कि पर्यावरण केवल पेड़-पौधों, नदियों, पहाड़ों और जंगलों का नाम नहीं है, बल्कि यह उस संपूर्ण प्राकृतिक व्यवस्था का हिस्सा है जिसमें मानव सहित असंख्य जीव-जंतु और वनस्पतियां जीवन जीती हैं। जैव विविधता को पृथ्वी पर जीवन के संतुलन की आधारशिला बताते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि पेड़-पौधे जहां हमें ऑक्सीजन, भोजन और औषधियां देते हैं, वहीं पक्षी, कीट व सूक्ष्मजीव परागण तथा मिट्टी के पोषक तत्वों के पुनर्चक्रण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। किसी भी एक प्रजाति का नुकसान पूरे पारिस्थितिक तंत्र को प्रभावित करता है।
शहरीकरण और जलवायु परिवर्तन जैव विविधता के लिए गंभीर चुनौती
वर्तमान वैश्विक स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि बढ़ता शहरीकरण, वनों की कटाई, प्रदूषण, प्राकृतिक संसाधनों का दोहन और जलवायु परिवर्तन जैव विविधता के सामने गंभीर संकट उत्पन्न कर रहे हैं। इसका सीधा प्रभाव केवल वन्यजीवों पर ही नहीं, बल्कि मानव जीवन, कृषि, जल संसाधनों और पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है।
साहिबगंज की प्राकृतिक विरासत का संरक्षण सामूहिक जिम्मेदारी
डॉ रणजीत कुमार सिंह ने विशेष रूप से साहिबगंज क्षेत्र का उल्लेख करते हुए कहा कि साहिबगंज की पहाड़ियां, जंगल, नदियां और जलस्रोत हमारी समृद्ध प्राकृतिक विरासत हैं। इनका संरक्षण केवल सरकारी संस्थाओं का काम नहीं, बल्कि स्थानीय समाज, शैक्षणिक संस्थानों और प्रत्येक नागरिक का सामूहिक दायित्व है।
विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन आवश्यक
उन्होंने जोर देकर कहा कि पर्यावरण संरक्षण का अर्थ केवल पौधारोपण तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि लगाए गए पौधों की देखभाल, जल संरक्षण, प्लास्टिक के उपयोग में कमी और प्राकृतिक आवासों की सुरक्षा भी उतनी ही आवश्यक है। उन्होंने संदेश दिया कि विकास और पर्यावरण एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं, बल्कि दोनों के बीच संतुलन और तालमेल बैठाने की जरूरत है। प्रकृति बचेगी तो ही मानव जीवन सुरक्षित रहेगा।
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